धंधा तो है गंदा है तो क्या हुआ? बिकेगा नहीं तो खाएंगे क्या? सेक्स वर्कर के दलाल की कहानी, उसकी जुबानी।
जीबी रोड! पुरानी दिल्ली की वो सड़क, जिसकी तिमंजिला इमारतों में किस्म-किस्म की कहानियां खदबदाती हैं. प्रेम की, धोखे की, नशे की...और सेक्स वर्क की।
इन मकानों के छज्जों से झांकते चेहरों और उनकी कही-अनकही पर हजारों दफा बात हो चुकी है। बीच-बीच में एक और टर्म सुनाई देता है- दलाल।
अगर आपकी चाल-ढाल में क्लाइंट के लक्षण नहीं, तो एजेंट आपके मुंह नहीं लगेंगे। मैं एक संस्था के जरिए इन तक पहुंचने की कोशिश की जाती है। वहां बताया जाता है-हां, एक लड़का है। उसकी मां इसी काम में थी। उसकी मौत के बाद वो बदल गया। हमारे साथ जुड़ गया। आप आइए, लेकिन बात होगी, या नहीं, वही ‘डिसाइड’ करेगा।
कारण कुछ घंटों बाद समझ आता है, जब किसी सेक्स वर्कर से मिलने की मेरी इच्छा पर टोकते हुए ‘रोशन’ कहते हैं- अभी तो उनकी बोहनी भी नहीं हुई होगी। जाएंगे तो ...फालतू में किच-किच करेंगी।
फिलहाल जिस एनजीओ के साथ ये एजेंट काम कर रहा है, वहां इन औरतों के बच्चे रहते हैं। रोशन का काम बच्चों से प्रेयर, योगा करवाना, उनकी देखभाल और जरूरत के सामान लाना है। वहाँ पहुंचने पर वहां मॉर्निंग गेदरिंग चल रही थी। उसे लीड करते हुए रोशन की आवाज एकदम बुलंद।
वो कहते हैं- पहले इतने एनजीओ नहीं थे। बच्चे अपनी मां को यही सब करता देखते बड़े हो जाते। फिर लड़की है तो मां का कमरा संभालती और लड़का हो तो सड़कों पर क्लाइंट खोजने निकल जाता, मैं भी उनमें से एक था।
उर्दू-मिली-हिंदी बोलते रोशन सबके सामने बात करने को राजी नहीं। चेहरा दिखाए बगैर रिकॉर्डिंग पर भी राजी नहीं। बड़ी मुश्किल से दलदल से निकला हूं, चेहरा नहीं लाऊंग।
लेकिन इस सड़क से बाहर आपको जानता ही कौन होगा? मेरे सवाल पर हंसते हुए वो कहता है- 'आपको क्या लगता है, यहां दो-चार घरों से लोग आते हैं! चांदनी चौक में शायद साड़ियों के उतने डिजाइन नहीं होंगे, जितने यहां नए-नए चेहरे दिख जाएंगे।'
















































































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