समृद्धि का देते हैं वरदान श्री गणेश के ये 8 रूप, अलग-अलग स्थान जहाँ स्वयं प्रकट हुए गणेश जी
श्री गणेश हिंदू धर्म में प्रथम पूज्यनीय देवता हैं। कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना इनकी पूजा के नहीं शुरू होता है। उनके ये 8 रूप हैं अत्यंत समृद्धिदायक। वैसे इनके देश भर में कई सारे मंदिर हैं, लेकिन आज हम आपको इनके आठ प्रमुख पावन धामों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अष्टविनायक मंदिर कहा जाता है।
विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की दिव्य महिमा कौन नहीं जानता है। आज बुधवार का दिन है इस दिन श्री गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि गणपति महाराज अपने भक्तों को हर प्रकार की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद जीवन में देते हैं। इसी के साथ अति ज्ञानी और विवेकवान होने का भी आशीर्वाद इनकी कृपा से प्राप्त होता है। बुधवार के दिन ज्यादातर लोग इनके मंदिर जाकर दर्शन करते हैं।
हिंदू धर्म में श्री गणेश किसी भी पूजा में सबसे पहले पूजे जाते हैं। यह वरदान उन्हें भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। आइए आज हम आपको उनके 8 प्रमुख मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके दर्शन करने मात्र से ही जीवन की हर प्रकार की परेशानियां मिट जाती हैं और गणेश भगवान की कृपा बरसती है। जिन मंदिरों के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं यहां हर प्रतिमा स्वयंभू रूप में विराजमान है। आर्थात इन 8 मंदिरों में श्री गणेश की जो प्रतिमाएं हैं वह स्वयं प्रकट हुई हैं ऐसी इन मंदिरों से जुड़ी मान्यता है।
अष्टविनायक मंदिर तीर्थ धाम
मयूरेश्वर मंदिर (मोरगांव)- यह मंदिर महाराष्ट्र राज्य के पुणे से लगभग 80-81 किलोमीटर के अंतर्गत मोरगांव में स्थित है। मान्यता है कि इस जगह पर भगवान गणेश ने मोर पर बैठ कर राक्षस सिंधरासुर का वध किया था। इस वजह से इस मंदिर का नाम मयूरेश्वर पड़ गया।
सिद्धिविनायक मंदिर (सिद्धटेक)- यह मंदिर अहमदनगर में स्थापित है। पूणे से इस मंदिर की दूरी लगभग 190-200 किलोमीटर है। मान्यता है कि यह मंदिर लगभग 200 वर्ष प्राचीन है। यहां जो भक्त आते हैं उनकी हर मनोकामना श्री गणेश पूरी करते हैं। यह श्री गणेश का सिद्ध स्थान है।
बल्लालेश्वर मंदिर (पाली)- यह मंदिर पाली गांव रायगण में स्थित है। इस मंदिर से जुड़ी मान्यता यह है कि भगवान गणेश के भक्त बल्लाल को उसके परिवार वालों ने श्री गणेश की मूर्ति के साथ जंगल में छोड़ दिया था। जंगल में बल्लाल ने उस समय श्री गणेश को भावुक हो कर याद किया। भगवान गणेश से अपने भक्त की व्यथा देखी न गई और उन्होंने उसे साक्षात दर्शन दिए। इस तरह इस स्थान का नाम बल्लालेश्वर मंदिर पड़ गया।
वरविनायक मंदिर (महाड़)- महाराष्ट्र राज्य के कोल्हापुर शहर के रायगढ़ में यह वरदविनायक मंदिर है। यहां दर्शन करने के लिए जो भी भक्त आते हैं माना जाता है उनको वरविनायक गजानन वरदान देते हैं।
चिंतामणी मंदिर (थेऊर)- मान्यता है कि यहां ब्रह्मा जी ने तपस्या की थी और उनका विचलित मंन शांत हो गया था। यह मंदिर थेऊर गांव के पास तीन नदियों मुला, मुथा और भीम के संगम के तट पर स्थित है।
गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर (लेण्याद्री)- यह पावन धाम भगवान गणेश के प्रमुख आठ सिद्ध अष्टविनायकों में से एक है। यह मंदिर लेण्याद्री गांव में स्थित है। पूणे से यह मंदिर लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। लोण्याद्री पहाड़ों पर यह मंदिर स्थित है।
विघ्नेश्वर अष्टविनायक मंदिर (ओझर)- यह मंदिर पूणे से लगभग 85 किलोमीटर की दूरी पर ओझर में स्थित है। पैराणिक मान्यता है कि विघनासुर नाम का राक्षस था जिसके आतंक से संत परेशान रहते थे। वो इन संतो की तपस्या में अड़चने डालता था। इसी स्थान पर भगवान गणेश ने इस असुर का वध किया था और संतों को उसके आतंक से मुक्त कराया था। इसलिए इस स्थान का नाम विघ्नेश्वर पड़ गया जो विघ्नो को हरने वाले श्री गणपति हैं।
महागणपति मंदिर (रांजणगांव)- अष्टविनायक मंदिरों में से यह भगवान गणेश का सबसे प्राचीन मंदिर है। माना जाता है की यह मंदिर 9-10वीं सदी पुराना है। इस मंदिर में श्री गणेश की प्रतिमा को माहोतक कहते हैं। श्री गणेश का यह मंदिर रांजणगांव के पुणे जिले में स्थित है।
















































































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