विपक्ष का गुब्बारा फिर फूटा! RAHUL GANDHI का सपना क्यों टूटा?
इंडिया ब्लॉक, जिसे भाजपा विरोधी मोर्चा माना जा रहा था, अब बिखरने की कगार पर है। इस साल के लोकसभा चुनावों में बहुमत से दूर रहने और हरियाणा-महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में एनडीए से मात खाने के बाद विपक्षी गठबंधन की स्थिति कमजोर हो गई है। सबसे पहले ममता बनर्जी ने राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी, जिसके बाद धीरे-धीरे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, एनसीपी नेता शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने ममता के नेतृत्व को स्वीकार किया। इसके बाद, अब तेजस्वी यादव ने इंडिया ब्लॉक को केवल लोकसभा चुनाव तक सीमित व्यवस्था बताते हुए इसके खात्मे की मुनादी कर दी है।
2019 से भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने के प्रयास होते रहे हैं। पहले चंद्रबाबू नायडू ने, फिर ममता बनर्जी और नीतीश कुमार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए थे, लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिली। ममता बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बंगाल में अपनी पार्टी टीएमसी को अकेले ही उतारा और कांग्रेस तथा वाम दलों से दूरी बना ली। उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे भाजपा से मुकाबला करने में अकेले ही सक्षम हैं। टीएमसी ने लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीत कर इंडिया ब्लॉक में तीसरी बड़ी पार्टी बनकर अपनी ताकत दिखाई।
लालू यादव और तेजस्वी के बदले रुख की वजह पार्टी की सीटों को लेकर बढ़ता दबाव है। खासकर कांग्रेस की ओर से सीटों की मांग और गठबंधन के भीतर बढ़ती राजनीतिक खींचतान ने स्थिति को जटिल बना दिया है। कांग्रेस को पिछले चुनावों में 70 सीटें मिली थीं, लेकिन आरजेडी को इस बात का मलाल है कि कांग्रेस को उतनी सीटें नहीं मिलतीं तो तेजस्वी यादव शायद मुख्यमंत्री बन सकते थे। इसी कारण, तेजस्वी ने अपनी बयानबाजी से कांग्रेस के इरादों का पर्दाफाश किया है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और अन्य नेताओं ने आगामी चुनावों में सीटों को लेकर अपनी अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं। कांग्रेस बिहार में सीटों को लेकर आरजेडी से दबाव बना रही है, जबकि आरजेडी पिछले चुनाव की तरह कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है। तेजस्वी यादव ने इसी दबाव को देखते हुए इंडिया ब्लॉक के अस्तित्व पर सवाल उठाया है। यह स्थिति बेमेल गठबंधन की ओर इशारा करती है, जहां सीटों को लेकर अलग-अलग दलों के बीच असहमति बढ़ रही है। इस बिखराव के कारण इंडिया ब्लॉक की भविष्यवाणी अब और भी जटिल हो गई है, और यह साफ है कि लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी गठबंधन की स्थिति और भी कमजोर हो सकती है।
















































































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