भील आदिवासी - एक चुनावी मुद्दा . 2024 चुनाव से पहले भील प्रदेश की मांग क्यों तेज हो गई है?

 भील आदिवासी - एक चुनावी मुद्दा  . 

2024 चुनाव से पहले भील प्रदेश की मांग क्यों तेज हो गई है?

108 साल पुरानी इस मांग को भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) ने नए सिरे से उठाया  है  विधानसभा चुनाव में बीएपी की परफॉर्मेंस ने इस मांग को मजबूती भी दी  है। 
राजस्थान में बीएपी को 3 और मध्य प्रदेश में 1 सीट पर जीत मिली है. बीएपी राजस्थान विधानसभा की 4 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. बांसवाड़ा-डूंगरपुर इलाके में पार्टी का वोट प्रतिशत 27 के आसपास रहा।  

 आने वाले वक्त में भील प्रदेश की मांग बीजेपी की परेशानी बढ़ा सकती है. इसकी 2 वजहें भी हैं। 

1. गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी की ही सरकार है।  इन तीनों राज्यों में आदिवासियों की संख्या लगभग 4.4 करोड़ है। 
भील प्रदेश की मांग क्या है?
भील द्रविड़ का वील शब्द से बना हुआ है, जिसका मतलब होता है- धनुष. भारत में भील सबसे पुरानी जनजाति है, जिसकी आबादी करीब 1 करोड़ के आसपास है. भील जनजाति के लोग अपने लिए लंबे वक्त से अलग प्रदेश की मांग कर रहे हैं। 

साल 1913 में पहली बार मानगढ़ में समाजिक कार्यकर्ता और खानाबदोश बंजारा जनजाति के गोविंदगिरी ने अपने 1500 समर्थकों के साथ अलग प्रदेश की मांग रखी थी. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। 
रिहा होने के बाद गोविंदगिरी के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने मानगढ़ के पास बड़ा आंदोलन किया. आंदोलन को खत्म करने के लिए स्थानीय प्रशासन ने अंग्रेजों से सहायता मांगी. इसके बाद की पुलिसिया कार्रवाई में कई भील आदिवासी मारे गए थे।  

घटना के बाद गोविंदगिरी और पुंजा धीरजी को गिरफ्तार कर अंडमान जेल भेज दिया गया. आजादी के वक्त भी भील प्रदेश की मांग को लेकर सुगबुगाबहट हुई, लेकिन शुरू में इस मांग को ज्यादा तरजीह नहीं दी गई। 

इसके बाद वक्त-वक्त पर भील प्रदेश की मांग को लेकर आंदोलन होता रहता है। 

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