‘भारत बंद’ में मजदूर-किसान एकजुट: श्रमिक अधिकारों और निजीकरण के खिलाफ जबरदस्त विरोध।
देशभर में बैंकिंग, बीमा, डाक सेवाओं से लेकर कोयला खनन तक के विभिन्न क्षेत्रों के 25 करोड़ से अधिक कर्मचारी आज राष्ट्रव्यापी हड़ताल में हिस्सा ले रहे हैं। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा बुलाए गए इस ‘भारत बंद’ का उद्देश्य केंद्र सरकार की मजदूर विरोधी, किसान विरोधी और कॉर्पोरेट समर्थक नीतियों के खिलाफ विरोध जताना है। हड़ताल का मुख्य कारण पिछले साल श्रम मंत्री को सौंपी गई 17 मांगों की अनदेखी और नए चार श्रम कोडों के माध्यम से श्रमिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास है। यूनियनों ने आरोप लगाया है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण, आउटसोर्सिंग और ठेकाकरण की नीतियों को बढ़ावा दे रही है, जिससे काम के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं और हड़ताल के अधिकारों को खत्म किया जा रहा है। इस हड़ताल को संयुक्त किसान मोर्चा और ग्रामीण मजदूरों का भी समर्थन मिला है, जिससे यह आंदोलन और व्यापक हो गया है। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि पिछले एक दशक से वार्षिक श्रम सम्मेलन तक नहीं बुलाया गया, जो सरकार की श्रमिकों के प्रति उदासीनता को दर्शाता है। हड़ताल के कारण बैंकिंग, डाक, कोयला खनन, कारखाने और परिवहन जैसी प्रमुख सार्वजनिक सेवाएं भी प्रभावित होंगी। इस आंदोलन के माध्यम से ट्रेड यूनियनें मजदूरों के अधिकारों की रक्षा, सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों की बहाली और कार्यबल की सुरक्षा की मांग कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में ट्रेड यूनियनों ने 26 नवंबर 2020, 28-29 मार्च 2022 और 16 फरवरी 2024 को भी इसी तरह की राष्ट्रव्यापी हड़तालें आयोजित की हैं, जो इस व्यापक विरोध की गहराई और मजबूती को दर्शाती हैं।
















































































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