बिहार चुनाव से पहले SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: क्या वाकई गायब हो रहे हैं मतदाता? कोर्ट ने उठाए अहम सवाल, आधार कार्ड आधार अंतिम प्रमाण नहीं!
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले SIR (Summary Intensive Revision) प्रक्रिया को लेकर जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया है। मंगलवार, 12 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई, जिसमें मतदाता सूची से नाम हटाने, आधार की वैधता और नागरिकता के प्रमाण को लेकर तीखी बहस हुई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमाला बागची की पीठ ने कई गंभीर टिप्पणियां कीं और चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं पर सवाल भी उठाए।
सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी हुई है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक छोटे से विधानसभा क्षेत्र में 12 जीवित लोगों को मृत घोषित कर दिया गया, जबकि स्थानीय BLO ने कोई उचित जांच नहीं की। उन्होंने यह भी दावा किया कि लगभग 65 लाख नामों को मतदाता सूची से हटाया गया है, जिसे उन्होंने "सामूहिक बहिष्करण" करार दिया।
सिब्बल ने फॉर्म 4 और फॉर्म 6 की प्रक्रियाओं में विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि नागरिकों से ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जो देश की बड़ी आबादी के पास नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि सिर्फ 3% लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र है, जबकि पासपोर्ट 2.7% और मैट्रिक सर्टिफिकेट 14.71% लोगों के पास ही है।
इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “कुछ तो होना चाहिए जिससे यह साबित हो सके कि आप भारत के नागरिक हैं। आधार अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।”
वकील प्रशांत भूषण ने इस मुद्दे को और गंभीर बनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग पारदर्शिता से बच रहा है। उन्होंने दावा किया कि 10–12% वैध फॉर्म भरने वालों को भी BLO द्वारा ‘अनुशंसित नहीं’ करार दिया गया है, और यह जानकारी उन्हें एक व्हिसलब्लोअर से मिली है।
चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि यह सिर्फ ड्राफ्ट रोल है, और इतने बड़े अभ्यास में छोटी-मोटी गलतियाँ संभव हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर यह सिर्फ आशंका या अनुमान है और तथ्यात्मक प्रमाण नहीं है, तो यह गंभीर आरोप नहीं बनता। साथ ही कोर्ट ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची संशोधन का अधिकार है या नहीं, यही इस मामले की जड़ है।
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं — क्या यह मामला लोकतंत्र के सबसे बुनियादी अधिकार "मतदान" को प्रभावित करेगा या सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रहेगा?
















































































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