संजय राउत का बयान- उपराष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष ने दबाव की राजनीति अपनाई, विपक्ष ने हार मानने से किया इनकार।
देश के नए उपराष्ट्रपति के रूप में सी.पी. राधाकृष्णन के चुने जाने के बाद विपक्षी खेमे की ओर से भी लगातार बयानबाजी हो रही है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय राउत ने इस परिणाम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सिर्फ़ एक चुनावी हार या जीत का मामला नहीं है, बल्कि यह विचारधारा की लड़ाई थी। उन्होंने कहा कि हमारे उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि विपक्षी खेमे की कुल संख्या 315 थी। इसका मतलब साफ है कि कई सांसदों ने अंत समय में क्रॉस वोटिंग की। संजय राउत ने कहा कि इस चुनाव ने साफ कर दिया कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष किस तरह दबाव की राजनीति करता है और कैसे छोटे-छोटे लालच और दबाव के जरिए सांसदों का झुकाव बदला जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही हमारी संख्या पूरी तरह हमारे पक्ष में नहीं रही हो, लेकिन विपक्ष ने यह चुनाव पूरी मजबूती के साथ लड़ा और देशभर में यह संदेश देने में सफल रहा कि उपराष्ट्रपति का चुनाव सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन का साधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का अवसर भी है।
राउत ने कहा कि बी. सुदर्शन रेड्डी जैसे साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवार को विपक्ष ने एकजुट होकर खड़ा किया था, जो लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा को सबसे ऊपर रखने की सोच रखते हैं। वहीं सत्ता पक्ष ने अपनी ताकत और संसाधनों का पूरा इस्तेमाल किया। इसके बावजूद विपक्ष ने विचारधारा के स्तर पर लड़ाई लड़ी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता पक्ष यह जीत भले ही अपने नाम कर ले, लेकिन लोकतंत्र की असली जीत तब होगी जब सांसद अपने मन और अंतरात्मा की आवाज़ के आधार पर वोट दें। “यह परिणाम हमें हतोत्साहित नहीं करेगा, बल्कि आगे आने वाले चुनावों और संघर्षों के लिए और मज़बूत बनाएगा,” राउत ने कहा। कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में सिर्फ़ आंकड़े ही मायने नहीं रखते, बल्कि विचारधारा और सिद्धांतों की भी अपनी अहमियत होती है। विपक्ष की यह लड़ाई भले ही संख्याओं में हार गई हो, लेकिन संदेश देने में वह कामयाब रहा।
















































































Leave Your Message