‘हिंदू पाकिस्तान’ बनाना चाहता है संघ: सामना का दावा!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने पर जहां देशभर में विविध कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है, वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के मुखपत्र 'सामना' ने संघ की विचारधारा, इतिहास और वर्तमान भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सामना में प्रकाशित एक लेख में RSS के डीएनए, राष्ट्रवाद की परिभाषा और 'हिंदू राष्ट्र' के एजेंडे पर तीखा हमला बोला गया है।
स्वतंत्रता संग्राम में RSS की भूमिका पर सवाल
सामना का दावा है कि स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों में RSS की भूमिका नगण्य रही। लेख में लिखा गया कि जब देश आजादी के लिए लड़ रहा था, तब संघ के लोग न तो जेल गए और न ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन किया। फिर भी आज संघ राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता पर भाषण देता है, जो विचित्र है।
लेख में संघ पर यह भी आरोप लगाया गया कि संघ ने आजादी के आंदोलन में भाग लेने की बजाय खुद को उससे दूर रखा, और अब जब देश आज़ाद है तो वह राष्ट्रवाद का ठेका लिए घूम रहा है। सामना ने पूछा कि क्या संघ के एजेंडे में लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कोई स्थान है या नहीं।
संघ और ‘हिंदू राष्ट्र’ का एजेंडा
सामना ने संघ पर भारत को 'हिंदू पाकिस्तान' में बदलने की मंशा का आरोप लगाया। लेख में कहा गया कि संघ का असली उद्देश्य देश को ऐसा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाना है, जहां संविधान, लोकतंत्र और संसद जैसी संस्थाओं की बलि दी जा सके।
इस आलोचना का संदर्भ हाल ही में विजयादशमी पर दिए गए RSS प्रमुख मोहन भागवत के भाषण से जोड़ा गया, जिसमें उन्होंने बीजेपी के एजेंडे से मिलते-जुलते विचार रखे। सामना के अनुसार, इस मौके पर संघ से यह उम्मीद थी कि वह 100 वर्षों की यात्रा के बाद कोई नई दिशा या आत्ममंथन प्रस्तुत करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
मोदी-शाह शासन और संघ का समर्थन
सामना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के शासन को संघ के सपनों को पूरा करने वाला शासन बताया। लेख में आरोप है कि संघ ने एक ऐसी विचारधारा विकसित की है, जिसमें "कट्टर, सड़ी हुई मानसिकता" वाले हिंदू शासन को देश की एकता का प्रतीक बताया जाता है, न कि सहिष्णुता और विविधता को।
सामना ने यह भी कहा कि संघ ने मोदी-शाह की तारीफ करने के लिए ‘कायर और भाड़े के लोगों’ की फौज खड़ी कर दी है, जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत भी शामिल हो गए हैं।
निष्कर्ष
RSS के शताब्दी वर्ष पर सामना का यह तीखा लेख दिखाता है कि राजनीतिक और वैचारिक मतभेद किस स्तर तक गहरे हैं। जहां एक ओर संघ अपने 100 साल पूरे होने का उत्सव मना रहा है, वहीं विपक्षी पार्टियां और उनके समर्थक इसके इतिहास, विचारधारा और वर्तमान भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। आने वाले समय में यह वैचारिक संघर्ष और भी तेज हो सकता है।
















































































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