रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) में आत्मनिर्भरता की ओर भारत का बड़ा कदम!
भारत सरकार ने तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाया है। देश अब रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की तैयारी में है। इसके लिए केंद्र सरकार जल्द ही ₹7,350 करोड़ की एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू करने जा रही है। इस योजना का सीधा मकसद है — भारत में REPM का उत्पादन बढ़ाना और विदेशी आयात पर पूरी तरह से निर्भरता खत्म करना।
चीन की पाबंदी बनी वजह
यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब चीन ने अप्रैल 2025 में REPM के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसका सीधा असर भारत के ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और ग्रीन एनर्जी सेक्टर पर पड़ा। भारत REPM की अपनी 100% जरूरतें अभी तक चीन और अन्य देशों से आयात कर पूरा करता है।
चीन की इस नीति ने भारत को ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर इन हाई-परफॉर्मेंस मैग्नेट्स की सप्लाई में रुकावट आती है, तो देश के प्रमुख सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से अब भारत अपना खुद का मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार कर रहा है।
क्या है योजना?
इस नई योजना के तहत देश में 5 इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित की जाएंगी। इन यूनिट्स का कुल सालाना उत्पादन लक्ष्य 6,000 टन रखा गया है। प्रत्येक यूनिट 600 से 1200 टन के बीच उत्पादन कर सकेगी।
योजना को सफल बनाने के लिए सरकार ने 15% सब्सिडी देने का एलान किया है, जिससे निजी कंपनियां भी इस क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहित हों।
7 साल में बनकर तैयार होगा पूरा नेटवर्क
भारत सरकार ने इस योजना के क्रियान्वयन के लिए 7 साल की समय सीमा तय की है। एक मंत्रालय स्तरीय मॉनिटरिंग कमेटी भी गठित की जाएगी, जो सुनिश्चित करेगी कि काम तय समय पर पूरा हो और सभी लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।
क्यों जरूरी है REPM?
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स का इस्तेमाल उन उत्पादों में होता है, जहां उच्च परफॉर्मेंस, कॉम्पैक्ट साइज़ और स्थायित्व की जरूरत होती है। इनका व्यापक उपयोग निम्न क्षेत्रों में होता है:
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हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स
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डिफेंस टेक्नोलॉजी
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विंड टर्बाइंस और सोलर पैनल्स
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उच्च तकनीकी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण
REPM की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है और ऐसे में भारत का आत्मनिर्भर होना न सिर्फ आर्थिक रूप से फायदेमंद, बल्कि रणनीतिक रूप से अनिवार्य हो गया है।
निष्कर्ष
यह योजना भारत को न सिर्फ एक तकनीकी शक्ति बनाएगी, बल्कि उसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भी एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में उभारने में मदद करेगी। आने वाले वर्षों में यह कदम भारत की ग्रीन एनर्जी और डिफेंस क्षमता को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।
"आत्मनिर्भर भारत" की दिशा में यह एक और ठोस और दूरदर्शी कदम है।
















































































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