बिहार में महागठबंधन की 'महाभारत': सीट बंटवारे पर कांग्रेस की धमकी, तेजस्वी की मुश्किलें बढ़ीं!

बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी ज़ोरों पर है, लेकिन महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर घमासान मचा हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि कांग्रेस अब आरजेडी के खिलाफ दो टूक रुख अपनाने लगी है, और यदि जल्दी समझौता नहीं हुआ, तो कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने के संकेत भी दे दिए हैं।

कांग्रेस ने दिखाई आंखें, दी सीधी धमकी

सूत्रों के मुताबिक, आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर अब तक सहमति नहीं बन पाई है। कांग्रेस ने साफ कह दिया है कि अगर 12 अक्टूबर तक कोई नतीजा नहीं निकला, तो वह 13 अक्टूबर से अपने उम्मीदवारों की घोषणा और नामांकन शुरू कर देगी।

कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी की आज (10 अक्टूबर) ऑनलाइन बैठक हो रही है, जिसमें उम्मीदवारों की लिस्ट पर चर्चा होगी। इसके बाद 11 अक्टूबर को केंद्रीय चुनाव समिति उस सूची पर अंतिम मुहर लगाएगी।

12 अक्टूबर: निर्णायक दिन

कांग्रेस ने 12 अक्टूबर को आखिरी दिन तय किया है, जब वह महागठबंधन के भीतर सीट समझौते का इंतजार करेगी। अगर उस दिन भी सहमति नहीं बनी, तो कांग्रेस पहले चरण के क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी उतारना शुरू कर देगी।

मुलाकात नहीं, बढ़ी दूरियां

बिहार दौरे पर आए कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, जयराम रमेश और अधीर रंजन चौधरी की लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव से मुलाकात नहीं हो सकी, जो इस तनातनी को और बढ़ाने वाला संकेत माना जा रहा है।

कौन किस सीट पर अड़ा है?

  • कांग्रेस बिस्फी, बिहार शरीफ, निर्मली जैसी सीटें आरजेडी से मांग रही है, जो फिलहाल सहयोगी दलों के खाते में हैं।

  • वहीं, आरजेडी कांग्रेस से कहलगांव (भागलपुर) सीट मांग रही है, जिसे कांग्रेस किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं है।

  • आरजेडी ने माले से भी पालीगंज, घोसी और तरारी की सीटें मांगी हैं, जबकि माले ने इसके बदले इमामगंज और अन्य सीटों पर दावा ठोंक दिया है।

  • CPI की रुपौली सीट और CPM की बछवाड़ा सीट को लेकर भी कांग्रेस और आरजेडी के बीच रस्साकशी जारी है।

VIP पार्टी से भी नहीं बनी बात

तेजस्वी यादव की देर रात मुकेश सहनी से मीटिंग भी बेनतीजा रही। सहनी की पार्टी VIP कम से कम 20 सीटें चाहती है, जबकि महागठबंधन की तीनों बड़ी पार्टियां 12–15 सीटों से ज्यादा देने को राज़ी नहीं हैं।


बिहार में महागठबंधन फिलहाल घमासान और भ्रम के दौर से गुजर रहा है। अगर जल्द ही कोई रास्ता नहीं निकला, तो यह ‘एकजुटता’ सीटों के बंटवारे में ही बिखर सकती है। तेजस्वी यादव के सामने चुनौती अब सिर्फ विपक्ष को हराने की नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों को संभालने की भी है।

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