बिहार चुनाव 2025: महागठबंधन में बढ़ती खींचतान, सीट बंटवारे पर सस्पेंस बरकरार, कांग्रेस-आरजेडी में संवादहीनता?

बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी गलियारों में हलचल तेज होती जा रही है। लेकिन अगर महागठबंधन (I.N.D.I.A.) की बात करें, तो यहां हालात स्पष्ट नहीं बल्कि उलझे हुए नजर आ रहे हैं। सीटों के बंटवारे को लेकर न तो कोई ठोस ऐलान हो पाया है और न ही गठबंधन की एकजुटता धरातल पर दिख रही है।

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने जरूर दावा किया है कि महागठबंधन पूरी ताकत से एकजुट है, लेकिन सच्चाई इससे उलट नजर आ रही है। तेजस्वी दिल्ली से पटना लौटे हैं, पर जिस मुलाकात की सबसे ज्यादा उम्मीद थी – राहुल गांधी से – वो नहीं हो पाई। तेजस्वी की सिर्फ कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल से बातचीत हुई, जिसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया।

कांग्रेस से दूरी, सहयोगी दलों में बेचैनी

महागठबंधन के अन्य सहयोगी दलों की भी कांग्रेस से दूरी बनी हुई है। वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी भी राहुल गांधी से मिलने दिल्ली पहुंचे, लेकिन उन्हें भी खाली हाथ लौटना पड़ा। इससे यह संकेत मिल रहा है कि कांग्रेस इस समय महागठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग पर कोई ठोस पहल करने की स्थिति में नहीं है या फिर वह रणनीतिक चुप्पी साधे हुए है।

इधर एनडीए तैयार, उधर महागठबंधन भ्रम में

जबकि एनडीए खेमे में सीटों का बंटवारा लगभग फाइनल हो चुका है। जेडीयू और हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) ने अपने सिंबल भी बांट दिए हैं। बीजेपी ने भले ही औपचारिक लिस्ट जारी न की हो, लेकिन उम्मीदवारों को निजी तौर पर संकेत मिल चुके हैं। ऐसे में एनडीए के मुकाबले महागठबंधन की रणनीति बिखरी हुई नजर आ रही है।

CPIML ने खोला मोर्चा, फ्रेंडली फाइट की तैयारी

सीपीआई (एमएल) ने सबसे पहले मोर्चा खोलते हुए 6 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को सिंबल दे दिए हैं। इतना ही नहीं, उनका कहना है कि अगर बंटवारे में उनकी सीट किसी और को दी जाती है, तब भी वे उम्मीदवार नहीं हटाएंगे। यानी फ्रेंडली फाइट की तैयारी कर ली गई है, जो महागठबंधन की एकता पर सवाल खड़ा करता है।

आरजेडी भी दे रही है टिकट, कांग्रेस मौन

आरजेडी ने भी टिकट बांटना शुरू कर दिया है। लालू यादव से सिंबल लेते उम्मीदवारों की तस्वीरें सामने आई हैं। जबकि कांग्रेस अब भी न तो सीटों पर बात कर रही है, न उम्मीदवारों के नाम घोषित कर रही है। यह खामोशी गठबंधन में एक बड़े संवादहीनता की ओर इशारा करती है।

निष्कर्ष:

जहां एनडीए चुनावी रणभेरी बजा चुका है, वहीं महागठबंधन अभी तक अपने ही पाले में उलझा हुआ है। अगर सीटों का बंटवारा जल्द नहीं होता और छोटे दलों की नाराजगी यूं ही बनी रहती है, तो इसका सीधा नुकसान विपक्षी गठबंधन को ही होगा।

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