दिवाली से पहले यूपी में बिजली का झटका: गरीबों के लिए 1KW कनेक्शन हुआ 6 गुना महंगा, उपभोक्ता परिषद ने किया विरोध!
उत्तर प्रदेश में ऊर्जा विभाग की एक नई पहल ने गरीब और मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने के नाम पर बिजली कनेक्शन के चार्ज में छह गुना तक की वृद्धि की गई है। पहले जहां 1KW का कनेक्शन महज ₹1,032 में मिल जाता था, अब उसी के लिए ₹6,400 देने होंगे। यह फैसला दिवाली से पहले लागू कर दिया गया है, जिससे राज्य के हजारों परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
क्या है नया आदेश?
ऊर्जा विभाग ने 10 सितंबर, 2025 को आदेश जारी कर कहा कि अब हर नए कनेक्शन के साथ प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाना अनिवार्य होगा। इस मीटर की कीमत ₹6,061 है, जिसे उपभोक्ता को अपने पैसे से देना होगा। यानी अब नए कनेक्शन के लिए:
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पहले: ₹1,032 (872 रुपये का मीटर सहित)
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अब: ₹6,400 (6061 रुपये का मीटर + अन्य शुल्क)
गरीबों के सामने सबसे बड़ी चुनौती
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर गरीब और निम्न आय वर्ग के उपभोक्ताओं पर पड़ा है:
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1.74 लाख से अधिक लोगों ने कनेक्शन के लिए आवेदन किया।
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56,251 लोगों को ही अब तक कनेक्शन मिला।
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37,043 लोग पैसे जमा नहीं कर पा रहे हैं।
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23,192 ने पैसे दिए लेकिन कनेक्शन नहीं मिला।
कुल मिलाकर, हजारों परिवार बिजली कनेक्शन के लिए जूझ रहे हैं, और अब ये नया शुल्क उन्हें और पीछे धकेल रहा है।
उपभोक्ता परिषद का विरोध
यूपी उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने इस फैसले को "जनविरोधी" करार दिया है। उनका कहना है:
"बगैर नियामक आयोग की अनुमति के मीटर शुल्क थोपना नियमों के खिलाफ है। स्मार्ट मीटर की कीमत उपभोक्ताओं पर लादना उचित नहीं है। यह सरकार की गरीब समर्थक छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।"
उन्होंने यह भी कहा कि पीएम मोदी, सीएम योगी और ऊर्जा मंत्री के क्षेत्रों में भी लोग यह पैसा देने में सक्षम नहीं हैं।
केंद्र की योजना पर भी सवाल
केंद्र सरकार की RDSS योजना (Revamped Distribution Sector Scheme) के तहत यह निर्देश था कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर उपभोक्ताओं को मुफ्त में दिए जाएं। लेकिन यूपी में इसके उलट, उपभोक्ताओं से इसकी पूरी लागत वसूली जा रही है — और वह भी 6 गुना ज़्यादा।
उपभोक्ताओं की मांग
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बिना नियामक आयोग की अनुमति लिए गए आदेश को तत्काल वापस लिया जाए।
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गरीबों को मुफ्त या सब्सिडी पर स्मार्ट मीटर दिया जाए।
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पुराने कनेक्शन के चार्ज पर वापस लौटा जाए।
निष्कर्ष
दिवाली से पहले बिजली उपभोक्ताओं पर बढ़ा यह "आर्थिक बोझ" यूपी सरकार के लिए एक राजनीतिक संकट में बदल सकता है। गरीबों को राहत देने की बजाय जब उन्हें 6 गुना ज्यादा भुगतान करना पड़े, तो यह सवाल उठता है — क्या सरकार 'सबका साथ, सबका विकास' के वादे पर खरी उतर रही है?
















































































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