बिहार चुनाव 2025: एनडीए की लिस्ट में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बेहद कम, सिर्फ जेडीयू ने 4 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे!

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में तैयारियां अंतिम चरण में हैं। एनडीए के सभी घटक दलों ने अपने-अपने हिस्से की सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। लेकिन उम्मीदवारों की इस सूची में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगभग न के बराबर है। जेडीयू को छोड़कर किसी भी दल ने मुस्लिम समाज से एक भी उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। जेडीयू ने भी केवल 4 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं — जबकि राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 17% है।

2020 की हार से सबक?

जेडीयू ने वर्ष 2020 में 11 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन सभी हार गए। इसके बाद पार्टी के भीतर यह सवाल उठने लगा कि क्या मुस्लिम समुदाय अब जेडीयू पर भरोसा नहीं करता? यही वजह है कि 2025 के चुनाव में जेडीयू ने सिर्फ 4 मुस्लिम चेहरों को मौका दिया है। यह संख्या 2005, 2010 और 2015 के मुकाबले काफी कम है।

  • 2005: 9 मुस्लिम उम्मीदवार

  • 2010: 17 मुस्लिम उम्मीदवार

  • 2015: 7 मुस्लिम उम्मीदवार (तब जेडीयू RJD के साथ थी)

  • 2020: 11 उम्मीदवार, सभी पराजित

सहयोगी दलों का रुख

एनडीए के अन्य घटकों ने तो इस बार मुस्लिम प्रत्याशियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है:

  • भाजपा (101 सीटें)कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं

  • हम (6 सीटें)कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं

  • लोजपा-रामविलास (29 सीटें)कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं

  • आरएलएम (उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी)कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं

ऐसे में एनडीए में मुस्लिम समुदाय के नाम पर सिर्फ जेडीयू की ही मौजूदगी रह गई है — वह भी सीमित स्तर पर


क्या भाजपा के साथ गठबंधन है नाराजगी की वजह?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जेडीयू के मुस्लिम वोटबैंक में गिरावट की सबसे बड़ी वजह नीतीश कुमार का भाजपा के साथ लंबा रिश्ता रहा है। भले ही नीतीश ने मुस्लिम समाज के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई हों — जैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा, मदरसों को आधुनिक बनाने की पहल, छात्रवृत्ति योजनाएं, वक्फ बोर्ड के लिए काम — लेकिन भाजपा की संगत ने मुस्लिम समाज में उनके प्रति अविश्वास पैदा किया है

2020 के चुनाव के बाद जेडीयू नेताओं ने भी खुले तौर पर स्वीकार किया कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिले। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने यहां तक कह दिया कि "जो वोट नहीं देता, उसका काम क्यों करें?" ऐसे बयान भी पार्टी की मुस्लिम छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।


इफ्तार का बायकॉट और वक्फ कानून का विवाद

2024 में वक्फ कानून पर जेडीयू का भाजपा के साथ खड़ा होना भी मुस्लिम समुदाय को खटका। रमज़ान में जब नीतीश कुमार ने इफ्तार पार्टी दी तो कई मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने उसका बहिष्कार कर दिया — यह एक स्पष्ट संदेश था कि भरोसा कमजोर हो चुका है।


सामाजिक समीकरणों का नया गणित

बिहार की राजनीति हमेशा जातीय समीकरणों पर टिकी रही है। लालू यादव की मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण की तर्ज पर नीतीश ने सभी जातियों को साधने की नीति अपनाई। खुद नीतीश 5% से भी कम आबादी वाली कुर्मी जाति से आते हैं, लेकिन उन्होंने खुद को विकास पुरुष और सुशासन बाबू के रूप में स्थापित कर बहुसंख्य समाज का समर्थन हासिल किया।

लेकिन मुस्लिम समुदाय को साधने की उनकी रणनीति अब शायद उतनी कारगर नहीं रही। विकास के बावजूद सामाजिक भरोसा कमजोर हुआ है — यही कारण है कि जेडीयू अब मुस्लिम वोट को लेकर 'प्रैक्टिकल' राजनीति की ओर बढ़ती दिख रही है।


निष्कर्ष:

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लगभग नजरअंदाज कर दिया है। जेडीयू ने 2020 की हार को देखते हुए इस बार जोखिम घटाया है, वहीं भाजपा और अन्य दलों ने साफ तौर पर मुस्लिम उम्मीदवारों से दूरी बनाए रखी है

अब देखना ये होगा कि महागठबंधन (RJD-कांग्रेस आदि) इस शून्य का कैसे फायदा उठाता है और मुस्लिम वोटबैंक को किस हद तक अपने पक्ष में कर पाता है।

क्या मुस्लिम वोटबैंक का भरोसा अब पूरी तरह महागठबंधन की ओर मुड़ गया है?
या फिर जेडीयू के पास अब भी कोई “साइलेंट” समर्थन बचा है?

इस सवाल का जवाब बिहार के नतीजे तय करेंगे।

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