हरिद्वार की गंगा में क्यों सूख जाता है पानी? जानिए दशहरे से दीपावली तक नहर बंदी के पीछे की पूरी सच्चाई!

हरिद्वार के घाटों पर इन दिनों सूखी गंगा देखकर हर कोई हैरान है। न केवल श्रद्धालु, बल्कि किसान भी चिंतित हैं क्योंकि गंगा का जल सिंचाई के लिए भी बंद हो चुका है। दरअसल, हर साल दशहरे की मध्यरात्रि से दीपावली तक गंगा की ऊपरी नहर में पानी का प्रवाह बंद कर दिया जाता है, और यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा वर्षों से चली आ रही एक वार्षिक योजना का हिस्सा है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इस दौरान गंगा की धारा क्यों रोकी जाती है? और इन 18-20 दिनों में ऐसा क्या खास होता है?

“जैसे दीपावली से पहले घर की सफाई, वैसे गंगा की सफाई”

उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता इंजीनियर अनुज बंसल के अनुसार, यह समय गंगा नहर की सालाना मरम्मत और सफाई के लिए बेहद जरूरी होता है। इस दौरान कई जरूरी कार्य पूरे किए जाते हैं जो नहर में पानी रहते संभव नहीं होते

इनमें प्रमुख कार्य हैं:

  • नहर की गाद (सिल्ट) की सफाई

  • टाई लाइन और सीसी लाइन की मरम्मत

  • घाटों की मरम्मत

  • नहर किनारे उगी घास और झाड़ियों की सफाई

  • गेट, पुलिया और अन्य संरचनाओं की जांच व मरम्मत

इंजीनियर अनुज बंसल बताते हैं कि यदि कोई कार्य इस बंदी के दौरान नहीं हो पाया, तो उसे अगले साल तक टालना पड़ता है। इसलिए बंदी की योजना कई सप्ताह पहले से तैयार की जाती है और पानी बंद होते ही कार्य युद्धस्तर पर शुरू कर दिए जाते हैं।

इस साल क्या खास हुआ?

इस साल धनौरी क्षेत्र में करीब 10 टन गाद (सिल्ट) हटाई गई है, जो वर्षों से जमा हो रही थी। वहीं पिरान कलियर क्षेत्र से लगभग 4 टन मलबा, जिसमें कपड़े, बोरी, प्लास्टिक व सिल्ट शामिल थे, बाहर निकाला गया है। ये कार्य विशेष रूप से इस बार की विशेष सफाई योजना के अंतर्गत किए गए हैं।

किसानों के लिए भी चुनौती

हालांकि ये कार्य गंगा और नहर की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी हैं, लेकिन इस दौरान किसानों को सिंचाई के पानी की कमी से जूझना पड़ता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें लाभ और असुविधा दोनों साथ चलते हैं।

निष्कर्ष

हर साल होने वाली यह वार्षिक नहर बंदी केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि गंगा और उसके सहायक जल स्रोतों को जीवित और स्वच्छ रखने की एक अहम कड़ी है। दीपावली से पहले जैसे घरों की सफाई होती है, वैसे ही गंगा की सफाई भी ज़रूरी है — और यही इसकी परंपरा है।

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