क्यों मनाई जाती है 'छिन्नमस्ता जयंती' जाने इसके महत्व और स्वरूप?
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है। देवी छिन्नमस्ता 10 महाविद्याओं में से एक है। इनकी आराधना से सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं। दस महाविद्याओं की उत्पत्ति देवी सती के क्रोध से हुई थी। इनकी पूजा से व्यक्ति को तंत्र-मंत्र की सिद्धि भी प्राप्त होती है इसलिए गृहस्थ जीवन वालों को महाविद्या की पूजा बेहद सावधानी पूर्वक और सामान्य रूप से पूजा करनी चाहिए। छिन्नमस्ता जयंती 21 मई 2024 मंगलवार को मनाई जाएगी। देवी छिन्नमस्तिका सात्विक, राजसिक तथा तामसिक, इन तीनों ही गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी छिन्नमस्ता की पूजा सामान्य तौर पर करें, मंत्रों का जाप करें।
छिन्नमस्ता का स्वरूप
छिन्नमस्ता का अर्थ होता है – कटा हुआ मस्तक, देवी छिन्नमस्ता का स्वरूप बेहद वीभत्स्य है। देवी छिन्नमस्ता अपने एक हाथ में अपना स्वयं का कटा हुआ शीश और दूसरे हाथ में खड्ग धारण करती हैं। उनके गले से रक्त की तीन धारायें प्रवाहित होती हैं। देवी छिन्नमस्ता को प्रचण्ड चण्डिका के नाम से भी जाना जाता है।
छिन्नमस्ता पूजन का महत्व
छिन्नमस्ता देवी दस महाविद्याओं में छठवीं देवी हैं। देवी छिन्नमस्ता की आराधना तांत्रिक सिद्धियों और विशेष मनोकामनाओं के पूर्ति के लिए किया जाता है। मान्यता के मुताबिक वे सभी प्रकार की चिंताओं का अंत करती हैं। इसलिए वे चिंतपूर्णी देवी भी कहलाती हैं। कोर्ट-कचहरी के मुकदमों से छुटकारा, सरकार में ऊंची पद और प्रतिष्ठा, बिजनेस में प्रसार और मुनाफा, रोग मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य पाने के लिए इनकी पूजा और साधना विशेष तौर पर की जाती है। मान्यता है कि तांत्रिक अनुष्ठानों और विधि-विधान से की गई पूजा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
छिन्नमस्ता मूल मंत्र - श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा॥
इसलिए मनाई जाती है छिन्नमस्ता जयंती
यह बात सुनकर देवी पावती ने क्रोध में आकर खड्ग से अपना शीश (सिर) धड़ से अलग कर दिया। इससे रक्त की तीन धाराएं निकली। देवी पार्वती ने दो धाराओं से दोनों सहचरियों की भूख मिटाई किया और तीसरी धारा से खुद को तृप्त किया। देवी पार्वती के भीषण रूप में भी कल्याण होने से छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है।
















































































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