इस्लामिक इतिहास में मुहर्रम का महत्व, इमाम हुसैन के बलिदान की याद।
सऊदी अरब में 7 जुलाई से मुहर्रम का आरम्भ हो चूका है। मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म के लोगों के लिए बहुत खास होता है। यह महीना त्याग और बलिदान की याद दिलाता है। मुहर्रम, बकरीद के 20 दिन बाद मनाया जाता है। मुहर्रम के दिन खुदा के नेक बंदे हजरत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी, इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग इस महीने हुसैन को याद करते हुए मातम मनाते हैं। हजरत इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे। मुहर्रम पर हुसैन की याद में ताजिया उठाया जाता है और मुस्लिम समुदाय के लोग मातम मनाते हुए रोते हैं। इस्लामिक मान्यता के अनुसार कर्बला की जंग 1400 साल पहले हुई थी। जिसमें पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। इस्लाम की शुरुआत मदीना से मानी जाती है।
मुहर्रम में मुसलमान समुदाय द्वारा इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का एक महत्वपूर्ण त्योहार होता है। कर्बला की जंग में इमाम हुसैन और उनके साथी ने यजीद के खिलाफ खड़ा होकर धर्म और सत्य के लिए संघर्ष किया। यह घटना इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण है, जिसके माध्यम से विशेष रूप से शिया मुसलमान समुदाय में विशेष भक्ति और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है। मुहर्रम की 10 तारीख को यजीद की फौज और हुसैन के काफिले के बीच एक महत्वपूर्ण झड़प हुई थी। यजीद की फौज बहुत बड़ी थी और हुसैन के साथ सिर्फ 72 लोग थे। हुसैन ने अपने साथियों से कहा कि वे उन्हें छोड़कर चले जाएँ, लेकिन कोई भी नहीं गया। हुसैन जानते थे कि यजीद उन्हें नहीं छोड़ेगा। यजीद बहुत ताकतवर था और उसके पास बहुत सारे हथियार थे, जबकि हुसैन के पास इतनी ताकत नहीं थी। फिर भी हुसैन ने यजीद के सामने झुकने से इंकार कर दिया। हुसैन ने अपने साथियों के साथ मिलकर यजीद की फौज से मुकाबला किया, लेकिन कोई भी हुसैन को छोड़कर वहां से नहीं गया। यह घटना हुसैन और उनके साथियों की वीरता और साहस का परिचय देती है।
















































































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