श्रावण माह में 'पुत्रदा एकादशी' का महत्व शुभ मुहर्त और व्रत कथा की पूर्ण जानकारी !

हिन्दू धर्म में एकादशी का एक बहुत ही विशेष महत्व होता है। आज, 16 अगस्त को पुत्रदा एकादशी का व्रत मनाया जा रहा है। सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी का व्रत करने का महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन जो व्यक्ति भगवान श्री विष्णु की उपासना और व्रत करता है, उसकी सुंदर और स्वस्थ संतान प्राप्ति की कामना पूरी होती है। इसके अलावा, जो व्यक्ति ऐश्वर्य, संतान, स्वर्ग, और मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखता है, उसे भी इस व्रत को करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओ के अनुसार जो भी व्यक्ति श्रावण माह की पुत्रदा एकादशी का व्रत रखता है उसे एक विशेष फल की प्राप्ति होती है और जीवन में अनेक सफलता पर्याप्त होती है। इसके साथ- साथ संतान प्राप्ति का सुख प्रदान होता है। 

पुत्रदा एकादशी के शुभ मुहर्त, 
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 16 अगस्त सुबह 09:39 पर समाप्त हो रही है। इसलिए उदया तिथि को देखते हुए यह व्रत 16 अगस्त के दिन ही रखा जा रहा है। लेकिन व्रत का पारण 17 अगस्त सुबह 05:50 से सुबह 08:05 के बीच किया जा सकेगा। 

पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय की बात है जब भद्रावती नगर में एक सुकेतु नाम का एक राजा राज्य करता था। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। वह राजा धर्म को बहुत मानने वाले और प्रजापालक थे। लेकिन इतना सब कुछ होने के बाबजूद भी उनकी कोई संतान नहीं थी। राजा को इस बात की चिंता सदैव सताती थी कि आगे उसके वंश का नाम कैसे चलेगा। इस कारण राजा सुकेतु यह सोच कर बहुत दुःखी रहते थे। एक दिन उन्होंने अपने आश्रम में कुछ ऋषि-मुनियों को देखा, जो वहां भजन कीर्तन करते हुए आ पहुंचे थे। राजा क्योंकि धर्मनिष्ठ थे और उनकी संतों में आस्था थी। इस कारण वह उनके पास गए और उन्हें प्रणाम किया। उन तेजस्वी और विद्वान ऋषियों ने राजा को देखते ही उसके दुःखी होने का अंदाजा लगा लिया था। 

राजा जब उनके पास पहुंचे तो उनसे अपनी सारी समस्या बताई। मुनियों ने राजा से कहा कि आप पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखिएगा। इस दिन व्रत रखने से आपको संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा ने मुनियों की बात मानी और पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। व्रत के बाद राजा सुकेतु ने भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की और उन्होंने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। भगवान विष्णु ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और कुछ समय बाद राजा की पत्नी के गर्भ से एक पुत्र हुआ। राजा बहुत खुश हुआ और उसने पुत्रदा एकादशी व्रत के महत्व को लोगों को बताया।

 

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