भारत और चीन की व्यापारिक जंग: IFD समझौते पर छिड़ी नई लड़ाई।

भारत और चीन के बीच एक नई व्यापारिक लड़ाई छिड़ी हुई है, और इस बार लड़ाई सेनाओं की नहीं, बल्कि व्यापार की है। चीन, अपने नेतृत्व में निवेश सुविधा विकास (IFD) समझौते को लेकर मजबूती से खड़ा है, जिसे विश्व व्यापार संगठन (WTO) में अब तक 166 में से 128 देशों का समर्थन मिल चुका है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य वैश्विक निवेश माहौल को सुधारना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है, जिससे विशेष रूप से विकासशील देशों को फायदा होने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन भारत इस समझौते का विरोध कर रहा है, और उसे दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया और तुर्की का समर्थन भी मिल गया है।

भारत का विरोध मुख्य रूप से इस कारण है कि इसे लगता है कि यह समझौता उसकी नीतिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है, खासकर तब जब निवेश प्रवाह चीन से बाहर और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की ओर बढ़ रहा है। चीन के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इस समझौते को वैश्विक व्यापार को सुगम बनाने के लिए एक कदम मानता है, लेकिन भारत के लिए यह उसके प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर असर डाल सकता है, जिससे आर्थिक दृष्टि से चुनौती उत्पन्न हो सकती है।

भारत की स्थिति थोड़ी मुश्किल है, क्योंकि पाकिस्तान अब चीन के साथ इस समझौते का हिस्सा बनने को तैयार है, जो पहले इसमें शामिल नहीं था। चीन के पास WTO के 128 देशों का समर्थन है, जबकि अमेरिका ने इस समझौते से बाहर रहने का विकल्प चुना है। हालांकि, अमेरिका इसका विरोध नहीं कर रहा है, लेकिन वह किसी भी पक्ष की तरफ नहीं है। भारत का मानना है कि कई देश जो IFD का समर्थन कर रहे हैं, वे इस गलतफहमी में हैं कि इससे उन्हें फायदा होगा, जबकि विकासशील देशों के लिए यह उनकी नीतिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा।

भारत ने WTO के ढांचे में मछली पकड़ने और क्षमता से अधिक मछली पकड़ने की समस्याओं को हल करने के लिए "प्रति व्यक्ति सब्सिडी वितरण" मानदंड की वकालत की है। भारत का कहना है कि उसकी वार्षिक मछली पालन सब्सिडी केवल $35 प्रति मछुआरे है, जबकि कुछ यूरोपीय देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी $76,000 तक पहुंचती है। भारत का मानना है कि "प्रति व्यक्ति मानदंड" को अपनाने से मछली पकड़ने और क्षमता से अधिक मछली पकड़ने की समस्याओं को सटीक और न्यायसंगत तरीके से सुलझाया जा सकता है।

आने वाली 16-17 दिसंबर को जिनेवा में होने वाली WTO जनरल काउंसिल की बैठक में इस पर महत्वपूर्ण निर्णय हो सकते हैं, जो वैश्विक व्यापार और निवेश के परिदृश्य को नया मोड़ दे सकते हैं। अगर चीन अपने मंसूबों में सफल होता है, तो यह भारत के व्यापार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, और इससे FDI पर भी असर पड़ सकता है।

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