BRICS को लेकर ट्रंप का दावा झूठा निकला: हकीकत में बढ़ रहा है समूह का प्रभाव, नहीं गया कोई देश बाहर!
एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने बयान को लेकर विवादों में हैं। इस बार उन्होंने वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली बनते जा रहे BRICS को लेकर ऐसा दावा कर दिया, जिससे अमेरिका की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े हो गए। ट्रंप ने कहा कि, “हमारी सख्त टैरिफ नीति के बाद कई देश डरकर BRICS से बाहर हो गए।” लेकिन यह दावा पूरी तरह भ्रामक और गलत साबित हुआ है।
दरअसल, भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने ट्रंप के इस बयान को झूठा करार देते हुए कहा कि, “BRICS से कोई देश बाहर नहीं गया, बल्कि इसमें नई भागीदारियों का विस्तार हुआ है।” उन्होंने साफ कहा कि ट्रंप अब BRICS की बढ़ती ताकत से घबराने लगे हैं।
BRICS का बढ़ता प्रभाव
BRICS में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका के अलावा अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और अर्जेंटीना जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं। 2024 में BRICS ने 9 नए 'पार्टनर देश' भी जोड़े, जिनमें कजाखस्तान, बेलारूस, क्यूबा, नाइजीरिया, थाईलैंड, मलेशिया, उज्बेकिस्तान, युगांडा और बोलिविया शामिल हैं। यानी वास्तविकता ये है कि BRICS कमजोर नहीं हुआ, बल्कि और अधिक सशक्त हो रहा है।
ट्रंप की रणनीति: “अमेरिका फर्स्ट” या “सच्चाई से दूर”?
कूटनीतिक विशेषज्ञ ट्रंप के बयान को सिर्फ राजनीतिक स्टंट बता रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रंप अपने पुराने “अमेरिका फर्स्ट” एजेंडे को फिर से हवा देने की कोशिश में हैं। वे चीन और रूस जैसे देशों पर निशाना साधकर अमेरिकी मतदाताओं को लुभाना चाहते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में वे खुद अपनी क्रेडिबिलिटी को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
डॉलर पर मंडराता खतरा
ट्रंप का BRICS को लेकर डर शायद अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व पर मंडराते खतरे से जुड़ा है। BRICS लंबे समय से अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए डॉलर के विकल्प की दिशा में प्रयास कर रहा है। रूस और यूएई ने तेल व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का प्रयोग शुरू कर दिया है, जबकि चीन लगातार युआन में भुगतान को बढ़ावा दे रहा है।
भारत की संतुलनकारी भूमिका
भारत इस पूरे समीकरण में एक 'ब्रिजिंग पावर' के तौर पर उभरा है। जहां चीन और रूस अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों के विरोध में खड़े हैं, वहीं भारत अपनी रणनीतिक और आर्थिक संतुलनकारी भूमिका निभा रहा है। भारत का मकसद BRICS के मंच पर विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना है, न कि टकराव को बढ़ाना।
निष्कर्ष
ट्रंप का दावा कि “BRICS खत्म हो गया है” या “सभी देश बाहर हो गए हैं” न सिर्फ तथ्यों के विपरीत है, बल्कि यह दर्शाता है कि अमेरिका में कुछ वर्ग BRICS के बढ़ते कद को लेकर चिंतित हैं। असलियत यह है कि BRICS आज ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने वाला एक बड़ा मंच बनता जा रहा है और अमेरिकी टैरिफ की धमकियों से वह न तो डरा है, न ही टूटा है।
ट्रंप का यह बयान महज चुनावी रैली का जुमला लगता है, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय वास्तविकता का प्रतिनिधित्व।
















































































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